शिक्षकों को पढ़ाने की क्यों नहीं दी जाती है पूर्ण स्वतंत्रता
आज शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि शिक्षक से हर दिन नवाचार की उम्मीद की जाती है लेकिन उसे काम करने के लिए जो वातावरण दिया जाता है, वह मौलिकता का नहीं बल्कि आदेश पालन का वातावरण होता है

राजेश कटियार,कानपुर देहात। आज शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि शिक्षक से हर दिन नवाचार की उम्मीद की जाती है लेकिन उसे काम करने के लिए जो वातावरण दिया जाता है, वह मौलिकता का नहीं बल्कि आदेश पालन का वातावरण होता है। शिक्षक से कहा जाता है कि बच्चों को रचनात्मक बनाइए, सोचने की क्षमता विकसित कीजिए, प्रश्न पूछने की आदत डालिए लेकिन उसी शिक्षक को हर सुबह नए निर्देश, नए पोर्टल, नई रिपोर्ट, नए अभियान और आज यह करना है कल वह करना है की सूची थमा दी जाती है। धीरे-धीरे शिक्षक पढ़ाने वाला व्यक्ति कम और निर्देशों को निष्पादित करने वाला कर्मचारी ज्यादा बना दिया गया है। उसकी अपनी शिक्षण शैली, उसकी समझ, उसके अनुभव, उसकी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विकसित की गई विधियाँ सब कुछ शासनादेशों की मोटी फाइलों के नीचे दबने लगता है। हर स्तर से एक ही संदेश आता है जैसा कहा गया है वैसा ही कीजिए। ऐसे में शिक्षक की व्यक्तिगत बौद्धिक स्वतंत्रता कहाँ बचेगी? सच यह है कि व्यवस्था को अक्सर सोचने वाला शिक्षक नहीं पालन करने वाला शिक्षक ज्यादा सुविधाजनक लगता है क्योंकि जो शिक्षक अपने विचार से काम करेगा वह सवाल भी पूछेगा। वह यह भी पूछेगा कि हर जिले की परिस्थिति अलग होने के बावजूद एक जैसी गतिविधियाँ क्यों थोपी जा रही हैं? वह यह भी पूछेगा कि शिक्षा का समय पोर्टल अपडेट और फोटो अपलोड में क्यों खर्च हो रहा है? इसलिए धीरे-धीरे शिक्षक को इस मानसिक स्थिति में पहुँचा दिया जाता है जहाँ वह अपनी मौलिकता को सुरक्षित रखने के बजाय निर्देशों से बचकर निकलने की रणनीति सीखने लगता है। सबसे दुखद यह है कि शिक्षक की रचनात्मकता का मूल्यांकन भी अब प्रायः फॉर्मेटेड हो गया है। कौन-सी गतिविधि करनी है, उसका फोटो कैसा होगा, किस ऐप पर अपलोड होगा, किस दिन रिपोर्ट जाएगी सब पहले से तय। यानी नवाचार भी अब निर्देशित हो चुका है। यह वैसा ही है जैसे किसी चित्रकार से कहा जाए कि कुछ मौलिक बनाइए लेकिन रंग, आकार और रेखाएँ हम तय करेंगे। एक संवेदनशील शिक्षक के भीतर हर दिन अनेक विचार जन्म लेते हैं। वह अपने बच्चों के सामाजिक परिवेश को समझता है, उनकी भाषा, डर, कमजोरियाँ और संभावनाएँ पहचानता है। वह अपने अनुभव से कई बार ऐसी शिक्षण पद्धतियाँ विकसित कर सकता है जो किसी प्रशिक्षण मॉड्यूल से अधिक प्रभावी हों। लेकिन समस्या यह है कि व्यवस्था को शिक्षक की सोच पर भरोसा कम और नियंत्रण पर भरोसा ज्यादा हो गया है। हालत यह है कि कई शिक्षक अपनी ऊर्जा बच्चों के लिए कम और ऊपर क्या पूछ लिया जाएगा इस डर में ज्यादा खर्च कर देते हैं। वह पढ़ाते समय भी यह सोचता है कि कहीं कोई फोटो न रह जाए, कोई फॉर्म न छूट जाए, कोई लिंक समय पर न भर पाए। यानी शिक्षा का वातावरण धीरे-धीरे विश्वास से हटकर निगरानी आधारित होता जा रहा है।
तार्किक प्रश्न यह है कि यदि शिक्षक को हर छोटी-बड़ी चीज ऊपर से तय करके ही करनी है तो फिर उससे मौलिकता, प्रेरणा और नवाचार की उम्मीद क्यों की जाती है? मशीनें निर्देशों पर चलती हैं, शिक्षक अनुभव और संवेदना पर। यदि हर शिक्षक को केवल एक प्रशासनिक टेम्पलेट में ढाल दिया जाएगा तो शिक्षा जीवंत प्रक्रिया नहीं रह जाएगी केवल औपचारिक क्रियान्वयन बनकर रह जाएगी। यह भी समझना होगा कि मौलिकता केवल कुछ नया करने का नाम नहीं है। मौलिकता का अर्थ है शिक्षक को अपनी परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेने का सम्मान मिलना। उसे यह विश्वास मिलना कि वह केवल आदेश मानने वाला कर्मचारी नहीं बल्कि शिक्षा प्रक्रिया का बौद्धिक केंद्र है। जब तक शिक्षा व्यवस्था शिक्षक को भरोसे के बजाय नियंत्रण की नजर से देखती रहेगी तब तक विद्यालयों में निर्देश तो बढ़ते रहेंगे लेकिन वास्तविक रचनात्मकता घटती जाएगी और जिस दिन शिक्षक अपनी सोच छिपाने लगे, उस दिन शिक्षा केवल पाठ्यक्रम पूरी करने की प्रक्रिया रह जाएगी जीवन गढ़ने की नहीं।



