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प्रधानाध्यापक का पद ही बड़ा नहीं होता बल्कि उसकी जिम्मेदारियां बड़ी होती हैं

विद्यालय का प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक केवल पद से बड़ा नहीं होता बल्कि भूमिका से बड़ा होता है।

राजेश कटियार, कानपुर देहात। विद्यालय का प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक केवल पद से बड़ा नहीं होता बल्कि भूमिका से बड़ा होता है। उसे अक्सर यह भ्रम दे दिया जाता है कि वह सबसे ऊपर है जबकि सच यह है कि वह सबसे अधिक जिम्मेदारियों के बीच खड़ा हुआ व्यक्ति होता है। एक प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक मूलरूप से एक मैनेजर होता है और उसका सबसे कठिन काम फाइलें या आदेश नहीं बल्कि इंसानों को समझना और उन्हें साथ लेकर चलना होता है। विद्यालय एक छोटा समाज होता है जहाँ हर दिन अलग-अलग स्वभाव, अपेक्षाएँ और दबाव एक साथ काम कर रहे होते हैं।

एक तरफ छात्र हैं जिनकी जिज्ञासा और ऊर्जा को दिशा देनी है, दूसरी तरफ अभिभावक हैं जिनकी उम्मीदें कभी खत्म नहीं होतीं। शिक्षक हैं जो ज्ञान का वास्तविक कार्य कर रहे होते हैं वहीं अन्य कर्मचारी हैं जिनके बिना संस्थान का ढाँचा खड़ा नहीं रह सकता। इसके ऊपर मीडिया, प्रशासन और समाज की नजर भी रहती है। इन सबके बीच संतुलन बनाना किसी आदेश से नहीं बल्कि परिपक्व पीपल मैनेजमेंट से संभव होता है लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा भ्रम पैदा हो जाता है। कई लोग मैनेजमेंट का मतलब खुशामद समझ लेते हैं।

जैसे प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक का काम हर किसी को खुश रखना है। यह सोच जितनी खतरनाक है उतनी ही अव्यावहारिक भी। नेतृत्व का काम अपीजमेंट नहीं होता बल्कि न्यायपूर्ण संतुलन बनाना होता है। जिसका जितना अधिकार है उसे उतना ही स्थान मिलना चाहिए और जिसका जितना दायित्व है, उसे उतनी ही जवाबदेही भी निभानी चाहिए। यहीं पर असली नेतृत्व की परीक्षा होती है। बहुत से स्कूल इसलिए कमजोर हो जाते हैं क्योंकि वहाँ टैलेंट की पहचान नहीं होती। जो शिक्षक अच्छा पढ़ाता है उसे वही साधारण जिम्मेदारी दी जाती रहती है।

जो आयोजन कर सकता है उसे कागजी कामों में उलझा दिया जाता है और जो जिम्मेदारी से बचना चाहता है वह भीड़ में आराम से छिपा रहता है। यह स्थिति केवल शिक्षक की समस्या नहीं होती यह नेतृत्व की कमजोरी का संकेत होती है। एक सशक्त प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक की पहचान यह होती है कि वह अपने विद्यालय के लोगों को पढ़ना जानता है।

उसे पता होता है कि कौन शिक्षक बच्चों के साथ सबसे अच्छा संवाद बना सकता है, कौन विज्ञान प्रयोगशाला को जीवंत बना सकता है, कौन सांस्कृतिक गतिविधियों में ऊर्जा भर सकता है और कौन प्रशासनिक कामों को व्यवस्थित कर सकता है। जब सही व्यक्ति को सही जिम्मेदारी मिलती है तब विद्यालय केवल चलता नहीं बल्कि विकसित होता है। समस्या तब पैदा होती है जब प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक स्वयं को केवल आदेश देने वाला अधिकारी मानने लगता है। आदेश से काम चल तो सकता है लेकिन उत्कृष्टता पैदा नहीं होती।

उत्कृष्टता तभी पैदा होती है जब टीम के लोग अपने काम को केवल ड्यूटी नहीं बल्कि जिम्मेदारी समझने लगते हैं और यह भावना डर से नहीं बल्कि विश्वास और सही नेतृत्व से पैदा होती है इसलिए एक प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक के लिए सबसे जरूरी कौशल यह नहीं है कि वह कितने नियम जानता है बल्कि यह है कि वह कितने लोगों को साथ लेकर चल सकता है। एक अच्छा प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक वही होता है जो विद्यालय के भीतर छिपी प्रतिभाओं को पहचानता है, उन्हें सही जगह देता है और फिर उन्हें भरोसे के साथ काम करने देता है।

अंततः स्कूल की प्रगति किसी एक व्यक्ति की मेहनत से नहीं होती। स्कूल तब आगे बढ़ता है जब सही लोग, सही जगह पर, सही समय पर सही काम कर रहे होते हैं और यह व्यवस्था अपने आप नहीं बनती इसे बनाने के लिए एक ऐसे प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक की जरूरत होती है जो केवल पद का अधिकारी नहीं बल्कि टीम का सच्चा नेतृत्वकर्ता होता है।

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