सामाजिक परिवेश से होता है बच्चों का समग्र विकास
अगर बच्चों को ककहरा नहीं सिखाया जा सका है तो इसका मतलब यह नहीं कि शिक्षक असफल हैं।

राजेश कटियार, कानपुर देहात। बच्चे जो सीखते हैं वह उनके सामाजिक परिवेश और पारिवारिक समर्थन पर भी निर्भर करता है। आज हम जिस समस्या का सामना कर रहे हैं, वह केवल शैक्षिक नहीं है बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। समाज और परिवार ने उन बच्चों को ककहरा सिखाने में योगदान दिया होता तो स्थिति कुछ और होती लेकिन दुर्भाग्यवश वही समाज बच्चों को गाली देने की आदतें बड़ी आसानी से सिखा देता है। समाज और मीडिया द्वारा शिक्षकों को असफल ठहराने से पहले हमें उन परिस्थितियों को समझने की जरूरत है जिनमें शिक्षक काम कर रहे हैं।
अगर बच्चों को ककहरा नहीं सिखाया जा सका है तो इसका मतलब यह नहीं कि शिक्षक असफल हैं। इसका मतलब यह है कि बच्चे अपने समाज और परिवार से उस शिक्षा का समर्थन प्राप्त नहीं कर रहे हैं जिसकी उन्हें आवश्यकता है। समस्या का समाधान केवल शिक्षकों को कोसने से नहीं होगा। समाज और शिक्षक के बीच एक सेतु बनाना आवश्यक है जहां दोनो अपनी जिम्मेदारियों को समझें और बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए काम करें। शिक्षक को भी यह समझना होगा कि केवल पाठ्यक्रम को पूरा करना उनका कार्य नहीं है बल्कि उन्हें बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर भी ध्यान देना चाहिए।
वहीं समाज को यह मानना होगा कि बच्चे की नैतिक और सामाजिक शिक्षा उसकी जिम्मेदारी है न कि सिर्फ स्कूल की। मीडिया को भी अपनी भूमिका को सकारात्मक रूप से निभाने की आवश्यकता है। शिक्षकों की समस्याओं और चुनौतियों को उजागर करने के साथ-साथ समाज की भूमिका पर भी प्रश्न उठाए जाने चाहिए। इससे ही सही दिशा में विचार-विमर्श हो सकेगा और शिक्षा तंत्र को सुधारने में मदद मिलेगी। शिक्षकों को दोष देना आसान है लेकिन समाज की जिम्मेदारी को अनदेखा करना शिक्षा की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। शिक्षकों और समाज के बीच सामंजस्य ही हमें उस दिशा में ले जाएगा जहां बच्चों की शिक्षा सही मायने में सम्पूर्ण हो।
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