डिजिटल युग और सोशल मीडिया के दौर में शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलती एक अनोखी खबर सामने आई है। लंबे समय से सब कुछ ठीक होने का दावा करने वाले एक प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक (मास्टर जी) को उस वक्त हाथ-पांव फूलने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा जब हाथ में कैमरा थामे यूट्यूबर्स की एक टीम ने स्कूल में अचानक धावा बोल दिया। निरीक्षण के डर से विद्यालय प्रशासन ने आनन-फानन में दीवारों की पुताई कराई और टूटे फर्नीचर को छिपा दिया था लेकिन असली चुनौती तब सामने आई जब कैमरे का रुख अधिकारियों के बजाय सीधा डिजिटल दौर के बच्चों (जेन जी और जेन अल्फा) की तरफ मुड़ गया।
कैमरे के सामने आते ही मास्टर जी के दिखावे की पूरी तरह पोल खुल गई। जब यूट्यूबर ने बच्चों से समस्याओं के बारे में पूछा तो एक मासूम ने तुरंत बता दिया कि कमरे का पंखा पिछले महीने से खराब पड़ा है, जिसे ठीक कराने के बजाय बजट से दीवारें रंगवा दी गई थीं। मिड-डे मील पर बच्चे ने कहा कि खाना ठीक है लेकिन दाल में कभी-कभी नमक कम होता है और जब पसंदीदा शिक्षक का नाम पूछा गया तो जवाब मिला कि जो सर मोबाइल चलाना सिखाते हैं वे सबसे अच्छे हैं।
इस घटना ने प्रधानाध्यापक को गहरा सबक दिया और उन्होंने माना कि वे स्कूल को केवल कैमरे के लिए तैयार कर रहे थे बच्चों के लिए नहीं। उन्होंने समझा कि आज का बच्चा केवल रटे-रटाए उत्तर सुनने के बजाय सवाल पूछने और कारण जानने की हिम्मत रखता है। इसके बाद मास्टर जी ने फैसला लिया कि भविष्य में कंपोजिट ग्रांट का रुपया दिखावे पर खर्च नहीं होगा और स्कूल में कोई भी बदलाव करने से पहले खुद बच्चों की राय ली जाएगी।
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राजेश कटियार,कानपुर



