
देश की शिक्षा व्यवस्था बदलनी चाहिए और विद्यालयों का इंफ्रास्ट्रक्चर विश्वस्तरीय होना चाहिए। हर बच्चे को सुरक्षित भवन, पर्याप्त कक्षाएं, स्वच्छ शौचालय, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं, खेल का मैदान और आधुनिक शिक्षण संसाधन मिलने चाहिए।
यह केवल आम जनता का सपना नहीं है बल्कि सरकारी विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक भी यही चाहते हैं कि उनका बच्चा सुविधाओं के मामले में निजी विद्यालय के बच्चे से पीछे न रहे लेकिन इस व्यवस्था की कमियों के लिए शिक्षक को ही कठघरे में खड़ा करना न्यायसंगत नहीं है। विद्यालय की टूटी दीवार, जर्जर भवन, फर्नीचर की कमी, बिजली-पानी की समस्या या शिक्षकों के रिक्त पदों के लिए शिक्षक जिम्मेदार नहीं है। शिक्षक से केवल शिक्षण की गुणवत्ता पर जवाबदेही मांगी जानी चाहिए जबकि इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराना सरकार और व्यवस्था का काम है।
जिस शिक्षक से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा की जाती है, उसे चुनाव, जनगणना, सर्वेक्षण और विभिन्न पोर्टल्स के आंकड़े अपडेट करने जैसे गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगा दिया जाता है, जिससे मूल काम यानी बच्चों को पढ़ाना पीछे छूट जाता है। इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष सरकारी शिक्षक का संघर्ष है। एक सरकारी शिक्षक सीमित संसाधनों और विपरीत सामाजिक परिस्थितियों में देश की अगली पीढ़ी को शिक्षित कर रहा है। वह ऐसे बच्चों को स्कूल तक लाता है जिनके घरों में शिक्षा पहली प्राथमिकता नहीं है और जहाँ गरीबी के कारण स्कूल भेजना भी अतिरिक्त बोझ लगता है। व्यवस्था की देरी होने पर शिक्षक अपनी जेब से कॉपी-पेन या कक्षा की तात्कालिक जरूरतों को पूरा करता है।
इसके अलावा, महज छह रुपये प्रति बच्चा जैसी सीमित राशि में मध्यान्ह भोजन उपलब्ध कराना किसी जादू से कम नहीं है जिसके पीछे शिक्षक की रोजमर्रा की जद्दोजहद होती है। पेट भरने की चिंता से जूझ रहे बच्चे के हाथ में किताब थमाकर भविष्य का सपना दिखाना आसान काम नहीं है। वातानुकूलित कमरों में बैठकर तस्वीरों के आधार पर शिक्षक को कटघरे में खड़ा करने वाले लोग इस जमीनी हकीकत को भूल जाते हैं। शिक्षक की लापरवाही, अनुपस्थिति या शिक्षण गुणवत्ता की कमी पर सवाल उठाइए और जवाबदेही तय कीजिए लेकिन संसाधनों की कमी का दोष शिक्षक के सिर मत डालिए। चारदीवारी बनाना, शिक्षक नियुक्त करना, जर्जर भवन की मरम्मत या डिजिटल संसाधन उपलब्ध कराना पूरी तरह सरकार की जिम्मेदारी है।
आजादी के बाद भी देश में शिक्षा की दो समानांतर धाराएं हैं। एक तरफ सीमित संसाधनों से जूझता सरकारी विद्यालय और दूसरी तरफ महंगी होती निजी शिक्षा। यह केवल शिक्षा का नहीं बल्कि सामाजिक और अवसरों की समानता का प्रश्न है। अगर सरकारें विश्वस्तरीय शिक्षा चाहती हैं तो उन्हें सरकारी स्कूलों का ढांचा मजबूत करना होगा, पर्याप्त शिक्षक नियुक्त करने होंगे, उन्हें गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त करना होगा और शिक्षक को समस्या नहीं, समाधान का हिस्सा मानना होगा।
सिविल सोसाइटी और संगठनों को भी सही व्यवस्था से सवाल पूछना चाहिए। विद्यालय की बदहाली की तस्वीर दिखाकर शिक्षक को शर्मिंदा करने के बजाय, उसके साथ खड़े होकर यह पूछना चाहिए कि इतने कम संसाधनों में वह बच्चों को कैसे पढ़ा रहा है। शिक्षक के पास पढ़ाने की जिम्मेदारी और हाथ में चॉक है, लेकिन स्कूल का बजट बनाने या व्यवस्था बदलने की सत्ता नहीं।
शिक्षा व्यवस्था को बदलना है तो शिक्षक को दोषी ठहराकर नहीं बल्कि व्यवस्था को जिम्मेदार बनाकर बदलना होगा। क्योंकि सरकारी विद्यालय मजबूत होंगे तो गरीब का बच्चा मजबूत होगा उससे समाज मजबूत होगा और तभी देश वास्तव में विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा।
राजेश कटियार,कानपुर



