जरा हटकेआपकी बात

क्या दोहरी शिक्षा प्रणाली के खिलाफ सख्त फैसले ले पाएगा देश का भावी नेतृत्व

जब तक नीति-निर्माताओं के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, तब तक व्यवस्था का कायाकल्प होना असंभव।

देश में शिक्षा व्यवस्था के ढांचे को लेकर एक बार फिर एक बड़ा और असुविधाजनक सवाल सतह पर आ गया है। शिक्षाविदों और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि शिक्षा में असमानता केवल एक नीतिगत विफलता नहीं है बल्कि यह उस सत्ता-संरचना का नतीजा है जो विशेषाधिकारों के संतुलन पर टिकी हुई है।

सवाल यह उठ रहा है कि क्या देश में कभी ऐसा राजनीतिक नेतृत्व उभरेगा जो शिक्षा प्रणाली में पूर्ण समानता लागू करने का कड़ा साहस दिखा सके? ​समान शिक्षा का अर्थ केवल एक समान पाठ्यक्रम लागू करना नहीं है बल्कि यह नीति निर्माताओं और प्रशासनिक ढांचे की सीधी जवाबदेही से जुड़ा मुद्दा है। जब तक किसी मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी और एक गरीब नागरिक का बच्चा एक ही छत के नीचे, समान संसाधनों और शिक्षकों से शिक्षा ग्रहण नहीं करेंगे, तब तक व्यवस्था का स्तर बेहतर होना नामुमकिन है।

यदि सरकारी स्कूल की स्थिति बिगड़ती है, तो उसकी जिम्मेदारी सिर्फ स्थानीय शिक्षक की नहीं बल्कि बजट और नियम तय करने वाले नीति निर्माताओं की भी होनी चाहिए।
​विशेषज्ञों के अनुसार जब भी सार्वजनिक मंचों से निर्णय लेने वालों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने का प्रस्ताव रखा जाता है तो बहस को तुरंत सुरक्षा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सुविधा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसे तर्कों में उलझा दिया जाता है।विश्लेषक इन तर्कों को एक सुरक्षा कवच मानते हैं जिसके जरिए सत्ता खुद को उस साधारण व्यवस्था से दूर रखती है जो आम जनता के लिए तय की जाती है।

यही कारण है कि भाषणों में शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार बताया जाता है लेकिन नीतिगत स्तर पर इस हथियार को इतना सीमित रखा जाता है कि यह मौजूदा व्यवस्था को चुनौती न दे सके। ​समान शिक्षा कोई साधारण प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि जाति, वर्ग, भाषा और आर्थिक विषमता की अदृश्य दीवारों को ढहाने वाली एक सामाजिक क्रांति है। कोई भी राजनीतिक दल अपने स्तर पर इन दीवारों से टकराने का जोखिम आसानी से नहीं लेता। ​

राजनीतिक इच्छाशक्ति अपने आप पैदा नहीं होती बल्कि यह सामाजिक दबाव से बनती है। जब देश का मतदाता और समाज यह मान लेगा कि दोहरी शिक्षा प्रणाली लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है और जब जनप्रतिनिधियों से उनके बच्चों की शिक्षा को लेकर सीधे सवाल पूछे जाएंगे तभी पूरी राजनीति में इस समानता को लागू करने का वास्तविक साहस दिखाई देगा।

Related Articles

AD
Back to top button