शिक्षा के मंदिर बने कमाई के हब, बिना किसी टैक्स के कर रहे हैं करोड़ों के बारे न्यारे
यहाँ अभिभावक ग्राहक हैं, बच्चे उपभोक्ता हैं और शिक्षक मात्र एक डिलीवरी मैकेनिज्म बनकर रह गए हैं।

राजेश कटियार,कानपुर देहात। जब शिक्षा बाजार बनती है तो उसमें गुणवत्ता का मापदंड ज्ञान नहीं बल्कि ब्रांड और पैकेजिंग हो जाता है। छोटे निजी स्कूल, जो कभी सरकारी स्कूलों के विकल्प के रूप में उभरे थे अब खुद बड़े कॉरपोरेट स्कूलों के सामने असहाय खड़े हैं। एयर-कंडीशंड कक्षाएं, चमचमाते कैंपस, अंग्रेजी का आक्रामक प्रदर्शन और मार्केटिंग के दम पर खड़े किए गए ये कॉरपोरेट स्कूल शिक्षा को एक उत्पाद में बदल चुके हैं। यहाँ अभिभावक ग्राहक हैं, बच्चे उपभोक्ता हैं और शिक्षक मात्र एक डिलीवरी मैकेनिज्म बनकर रह गए हैं। सरकारी स्कूलों को अक्षम बताने की कहानी भी कोई अचानक उपजी सच्चाई नहीं है बल्कि यह एक लंबी और सुनियोजित प्रक्रिया का परिणाम है। पहले उन्हें संसाधनों से वंचित किया गया, शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में उलझाया गया, ढांचागत सुविधाओं को उपेक्षित रखा गया और फिर उन्हीं कमियों को उनकी अयोग्यता का प्रमाण बना दिया गया।
यह वैसा ही है जैसे किसी को दौड़ में धकेलकर उसके पैर बाँध दिए जाएँ और फिर उसकी हार का मजाक उड़ाया जाए। इसके समानांतर छोटे निजी स्कूलों को एक बेहतर विकल्प के रूप में खड़ा किया गया। मध्यमवर्ग और निम्न मध्यमवर्ग ने सरकारी स्कूलों से मोहभंग के चलते अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करके बच्चों को इन स्कूलों में भेजना शुरू किया। उन्हें लगा कि वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए एक सुरक्षित रास्ता चुन रहे हैं लेकिन यह व्यवस्था भी स्थायी नहीं थी क्योंकि इसका आधार शिक्षा नहीं बल्कि बाजार था। छोटे निजी स्कूलों की स्थिति आज विचित्र है वे न तो सरकारी संरक्षण में हैं, न ही कॉरपोरेट संसाधनों से लैस। फीस बढ़ाने पर अभिभावक विरोध करते हैं और कम रखने पर संस्थान टिक नहीं पाता। परिणाम यह है कि वे धीरे-धीरे या तो बंद हो रहे हैं या फिर बड़े ब्रांड्स के फ्रेंचाइजी बनकर अपनी स्वतंत्रता खो रहे हैं। यानी जो विकल्प कभी स्वतंत्रता का प्रतीक था, वही अब निर्भरता का उदाहरण बन गया है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम अब भी यह समझ पाए हैं कि शिक्षा को बाजार के हवाले करना कितना खतरनाक निर्णय था? जब शिक्षा सेवा होती है, तो उसका केंद्र समाज होता है लेकिन जब वह व्यवसाय बनती है तो उसका केंद्र लाभ हो जाता है और लाभ का तंत्र हमेशा असमानता को बढ़ाता है वह उन लोगों को बाहर कर देता है जो भुगतान नहीं कर सकते। आज यदि छोटे निजी स्कूल भी संकट में हैं तो यह केवल उनकी समस्या नहीं है यह पूरे शिक्षा तंत्र के असंतुलन का संकेत है। यह एक चेतावनी है कि यदि हमने शिक्षा को पुनः सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में नहीं देखा तो वह दिन दूर नहीं जब अच्छी शिक्षा केवल उन्हीं के लिए उपलब्ध होगी जो उसकी कीमत चुका सकें।
तब सरकारी स्कूल केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे और कॉरपोरेट स्कूल समाज में एक नई वर्ग-व्यवस्था खड़ी कर देंगे जहाँ ज्ञान नहीं बल्कि पैसे के आधार पर भविष्य तय होगा। अब भी समय है कि हम इस प्रवृत्ति को पहचानें और प्रश्न पूछें क्या हम अपने बच्चों को शिक्षित करना चाहते हैं या उन्हें बाजार की एक और वस्तु बनाना चाहते हैं? शिक्षा का असली उद्देश्य नागरिक बनाना है, ग्राहक नहीं। यदि यह बुनियादी समझ वापस नहीं आई तो आने वाले समय में स्कूल सचमुच एक सपना बन जाएंगे ऐसा सपना जिसे देखने का हक तो सबको होगा लेकिन पूरा केवल कुछ ही लोग कर पाएंगे।
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