स्कूल के शैक्षणिक परिवेश को सुदृढ़ बनाने में प्रधानाध्यापक और शिक्षकों के बीच आपसी तालमेल जरूरी
स्कूल के शैक्षणिक और समग्र परिवेश को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रधानाध्यापक और शिक्षकों के बीच तालमेल अत्यंत आवश्यक है। यह सहयोग साझा लक्ष्यों, पारदर्शी संवाद और आपसी सम्मान पर आधारित होता है। जब दोनों मिलकर काम करते हैं

राजेश कटियार,कानपुर देहात। स्कूल के शैक्षणिक और समग्र परिवेश को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रधानाध्यापक और शिक्षकों के बीच तालमेल अत्यंत आवश्यक है। यह सहयोग साझा लक्ष्यों, पारदर्शी संवाद और आपसी सम्मान पर आधारित होता है। जब दोनों मिलकर काम करते हैं तो वे एक सकारात्मक, समावेशी और प्रेरक वातावरण बनाते हैं जो छात्रों के बेहतर शैक्षणिक प्रदर्शन, भावनात्मक कल्याण और विकास को सीधे प्रभावित करता है। अधिकांश जनपदों के कुछ स्कूलों में देखा गया है कि सहायक शिक्षक या प्रधानाध्यापक स्कूल नहीं आना चाहते, पढ़ाना नहीं चाहते, जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते। यह केवल व्यक्तिगत लापरवाही नहीं बल्कि पेशेवर नैतिकता का गंभीर संकट है।
शिक्षक का पहला धर्म ही कक्षा है यदि वह नहीं निभाया जाता तो किसी भी तर्क या सहानुभूति की जमीन कमजोर पड़ सकती है। शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ा अन्याय तब होता है जब शिक्षक अपनी मूल जिम्मेदारी से बचने लगता है क्योंकि इसका सीधा नुकसान बच्चों का होता है और इस पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। कुछ स्कूलों से ऐसी भी प्रतिक्रिया आई है कि प्रधानाध्यापक कुछ नहीं जानते सिर्फ प्रवचन देते रहते हैं। सारा काम दूसरों (सहायक शिक्षकों) पर डाल देते हैं। यह भी उतनी ही गंभीर समस्या की ओर इशारा करती है। यह बताता है कि विद्यालयों में नेतृत्व और टीम के बीच विश्वास का पुल टूट चुका है। जहाँ संवाद खत्म होता है वहाँ आरोप शुरू होते हैं और यहीं एक बेहद खतरनाक प्रवृत्ति सिर उठाती है।
व्यक्तिगत अनुभव को सार्वभौमिक सत्य मान लेना। किसी एक स्कूल में मिली निराशा को पूरे शिक्षा तंत्र की सच्चाई घोषित कर देना न केवल बौद्धिक आलस्य है बल्कि यह समस्या के समाधान को भी जटिल बना देता है। यह वही मानसिकता है जहाँ मुझे ऐसा लगा धीरे-धीरे हर जगह ऐसा ही होता है में बदल जाता है। यह दृष्टिकोण कठोर तो लगता है लेकिन सच यही है कि इस तरह की सोच बहस को गंभीरता से उठाकर सतही आरोप-प्रत्यारोप में गिरा देती है।
किसी एक प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक या सहायक अध्यापक की कमजोरी पूरे नेतृत्व तंत्र को खारिज नहीं कर सकती और कुछ शिक्षकों की लापरवाही पूरे शिक्षक समुदाय को दोषी नहीं बना सकती लेकिन आसान रास्ता यही है कि हम अपने अनुभव को अंतिम सत्य मान लें और उसी के आधार पर पूरी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दें। यह दृष्टिकोण समाधान नहीं बल्कि भ्रम पैदा करता है। शिक्षाशास्त्र इस तरह की बहस को बिल्कुल अलग नजरिए से देखता है। वह कहता है कि किसी भी संस्था में समस्या व्यक्ति नहीं बल्कि व्यवस्था और कार्य-संस्कृति की होती है।
यदि कई शिक्षक जिम्मेदारी से बच रहे हैं तो यह भी देखना होगा कि क्या कार्य-विभाजन स्पष्ट है, क्या जवाबदेही तय है और क्या नेतृत्व निष्पक्ष है और यदि शिक्षक नेतृत्व से असंतुष्ट हैं तो यह भी समझना होगा कि क्या संवाद के रास्ते खुले हैं या केवल आदेश का माहौल है। यह भी ध्यान देने की बात है कि मोबाइल अनुशासन और कामचोरी जैसे मुद्दे लक्षण हैं, बीमारी नहीं।
असली बीमारी है काम के प्रति स्वामित्व की कमी। जब शिक्षक यह महसूस नहीं करता कि विद्यालय उसका भी है तब वह केवल औपचारिक उपस्थिति निभाता है और जब प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक यह मान लेता है कि कोई भी काम खुद ही करना पड़ेगा, तब वह टीम बनाना छोड़ देता है। यही वह बिंदु है जहाँ संस्था धीरे-धीरे व्यक्ति-निर्भर और कमजोर बन जाती है इसलिए समाधान किसी एक पक्ष को कठघरे में खड़ा करने में नहीं है। समाधान स्पष्ट जिम्मेदारी, पारदर्शी व्यवस्था और ईमानदार संवाद में है।
जो शिक्षक काम नहीं कर रहा उस पर स्पष्ट कार्यवाही होनी चाहिए यह संवेदनशीलता के नाम पर टाला नहीं जा सकता और जो प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक केवल आदेश दे रहा है लेकिन नेतृत्व नहीं कर रहा उसे भी आत्ममंथन करना होगा। अंततः सच्चाई यह है कि न तो हर प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक गलत है, न हर शिक्षक सही और न ही गलत।
शिक्षा का तंत्र या तो या में नहीं चलता, यह साथ-साथ में चलता है लेकिन साथ तभी बनता है जब दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करें न कि केवल अधिकारों की बात करें। विद्यालय कोई युद्ध का मैदान नहीं है जहाँ प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक और शिक्षक आमने-सामने खड़े हों। यह एक साझा जिम्मेदारी का मंच है जहाँ यदि एक भी पक्ष अपने कर्तव्य से हटता है तो सबसे बड़ा नुकसान उस बच्चे का होता है जो शिक्षकों से बड़ी आस लेकर स्कूल में पढ़ाई करने आता है।



