
जब भी शिक्षा में नई तकनीक आती है उसका स्वागत होना चाहिए। ब्लैकबोर्ड आया तो उसने स्लेट का विरोध नहीं किया, प्रोजेक्टर आया तो उसने ब्लैकबोर्ड को समाप्त नहीं किया, इंटरनेट आया तो उसने पुस्तकालय का महत्व पूरी तरह खत्म नहीं किया। हर नई तकनीक का उद्देश्य शिक्षक की क्षमता बढ़ाना था उसका स्थान लेना नहीं। समस्या तब शुरू होती है जब तकनीक को सहायक नहीं विकल्प मान लिया जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ शिक्षा का प्रश्न तकनीकी नहीं शिक्षाशास्त्रीय हो जाता है। शिक्षा और सूचना में सबसे बड़ा अंतर यही है कि सूचना मशीन दे सकती है लेकिन शिक्षा केवल मनुष्य देता है। एक बच्चा इंटरनेट से न्यूटन के तीनों नियम पाँच मिनट में पढ़ सकता है लेकिन यह विश्वास कि तुम यह समझ सकते हो कोई सर्च इंजन नहीं दे सकता।
गणित का सूत्र मोबाइल बता सकता है लेकिन जिस बच्चे को बार-बार असफल होने के बाद भी शिक्षक मुस्कुराकर कहता है एक बार और कोशिश करो उस प्रेरणा का कोई डिजिटल संस्करण अभी तक नहीं बना है।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्मार्ट क्लास, डिजिटल कंटेंट, रिकॉर्डेड लेक्चर और एल्गोरिदम आधारित मूल्यांकन को शिक्षा का भविष्य बताया जा रहा है। इन सबका अपना महत्व है लेकिन यदि इन्हीं साधनों के आधार पर यह मान लिया जाए कि अब शिक्षक की भूमिका गौण हो गई है तो यह शिक्षा की सबसे बड़ी गलतफहमी होगी क्योंकि शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पाठ्यवस्तु नहीं संबंध है। बच्चा पहले शिक्षक पर विश्वास करता है उसके बाद विषय पर। शिक्षाशास्त्री प्रवीण त्रिवेदी ने कहा कि एक अनुभवी शिक्षक जानता है कि एक ही पाठ तीस बच्चों को तीस अलग-अलग तरीकों से समझाना पड़ सकता है। वह बच्चे के चेहरे की झिझक पढ़ लेता है। वह यह पहचान लेता है कि कौन बच्चा उत्तर इसलिए नहीं दे रहा क्योंकि उसे नहीं आता और कौन इसलिए चुप है क्योंकि उसका आत्मविश्वास टूट चुका है। मशीन दोनों को केवल गलत उत्तर के रूप में दर्ज करेगी। शिक्षक दोनों के बीच का अंतर समझता है। यही अंतर शिक्षाशास्त्र है।
शिक्षा केवल अध्याय समाप्त करने का नाम नहीं है। कभी-कभी पूरी कक्षा का सबसे महत्वपूर्ण पाठ वह होता है जब शिक्षक किसी रोते हुए बच्चे के कंधे पर हाथ रख देता है। कभी वह एक झगड़ा सुलझाता है। कभी किसी बच्ची को पहली बार बोलने का साहस देता है। कभी किसी गरीब छात्र की फटी कॉपी देखकर अपनी जेब से नई कॉपी दिला देता है। इन क्षणों का कोई डेटा तैयार नहीं होता लेकिन यही क्षण शिक्षा की आत्मा बनते हैं। तकनीक की सबसे बड़ी सीमा यह है कि वह उत्तर देती है प्रश्न पैदा नहीं करती।
एक अच्छा शिक्षक कई बार उत्तर देने से पहले प्रश्न करना सिखाता है। वह बच्चे को केवल जानकारी नहीं देता जिज्ञासा देता है। वह केवल याद करना नहीं सिखाता संदेह करना भी सिखाता है। लोकतंत्र, विज्ञान और ज्ञान तीनों की शुरुआत प्रश्न से होती है। यदि शिक्षा केवल तैयार उत्तर देने वाली व्यवस्था बन गई तो हम जानकार लोग तो तैयार कर लेंगे लेकिन विचारशील नागरिक नहीं। विडंबना यह है कि आज कई जगह शिक्षा का मूल्यांकन भी उसी आधार पर होने लगा है जिस पर मशीनें सबसे अच्छी हैं। डेटा, रिपोर्ट, ग्राफ, प्रतिशत और डैशबोर्ड लेकिन किसी रिपोर्ट में यह कॉलम नहीं होता कि इस वर्ष कितने बच्चों ने पहली बार आत्मविश्वास से बोलना सीखा। कोई पोर्टल यह नहीं बताता कि किस शिक्षक ने एक विद्यालय छोड़ने वाले बच्चे को वापस कक्षा तक पहुँचाया।
कोई ऐप यह नहीं मापता कि किस अध्यापक ने किसी निराश विद्यार्थी के जीवन की दिशा बदल दी क्योंकि जो सबसे मूल्यवान है वही सबसे कम मापा जा सकता है। यदि शिक्षा का अर्थ केवल सामग्री पहुँचाना होता तो दुनिया के सबसे बड़े शिक्षक पुस्तकालय होते। यदि केवल वीडियो से सीखना पर्याप्त होता तो विद्यालयों की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती। यदि केवल परीक्षा में अंक ही गुणवत्ता का प्रमाण होते तो इतिहास के अनेक महान वैज्ञानिक, कलाकार और विचारक औसत विद्यार्थी कहलाते। शिक्षा हमेशा मनुष्य और मनुष्य के बीच घटित होने वाली प्रक्रिया रही है। तकनीक का दूसरा खतरा यह है कि वह धीरे-धीरे शिक्षक को निर्णय लेने वाले पेशेवर से निर्देशों का पालन करने वाले ऑपरेटर में बदल सकती है। पहले पाठ योजना बनाई जाती थी अब डाउनलोड की जाती है।
पहले शिक्षक उदाहरण खोजता था, अब स्क्रीन पर दिखाए गए उदाहरण तक सीमित रहने का दबाव बढ़ रहा है। पहले कक्षा शिक्षक की रचनात्मकता से चलती थी, अब कई जगह उसे पहले से तैयार डिजिटल स्क्रिप्ट के अनुसार चलाने की कोशिश हो रही है। यह सुविधा अवश्य है लेकिन यदि यही स्थायी व्यवस्था बन गई तो शिक्षक की सृजनात्मक भूमिका सिकुड़ती चली जाएगी। सबसे अधिक चिंता उन बच्चों को लेकर होनी चाहिए जो पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं जिनके घर में पढ़ाई का वातावरण नहीं है, जिनकी भाषा, संस्कृति और जीवनानुभव अलग हैं। उन्हें केवल डिजिटल सामग्री नहीं, एक जीवंत शिक्षक चाहिए। उन्हें कोई ऐसा चाहिए जो उनकी आँखों में देखकर कह सके तुम भी सीख सकते हो। यह वाक्य किसी स्क्रीन से अधिक प्रभावशाली होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि तकनीक का विरोध किया जाए।
तकनीक का विरोध उतना ही अव्यावहारिक है जितना उसका अंध-समर्थन। आवश्यकता इस बात की है कि तकनीक शिक्षक के हाथ का औजार बने, शिक्षक तकनीक का पुर्जा न बने। निर्णय एल्गोरिदम नहीं, शिक्षाशास्त्र ले। डेटा सहायक बने, निर्णायक नहीं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षण को समृद्ध करे, शिक्षकों को अप्रासंगिक घोषित न करे। किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी भूल तब शुरू होती है जब वह साधन को उद्देश्य समझ बैठती है। शिक्षा का उद्देश्य कभी टैबलेट, ऐप, स्मार्ट बोर्ड या कृत्रिम बुद्धिमत्ता नहीं हो सकता।
उसका उद्देश्य आज भी वही है जो सदियों पहले था एक मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाना। यह काम मशीनें आसान बना सकती हैं लेकिन पूरा नहीं कर सकतीं।इसलिए याद रखिए, जब तक तकनीक शिक्षक की सेवा में है वह प्रगति है लेकिन जिस दिन शिक्षक तकनीक की सेवा में खड़ा कर दिया जाएगा उसी दिन शिक्षा का केंद्र बच्चे से हटकर प्रणाली बन जाएगा और जिस शिक्षा में प्रणाली मनुष्य से बड़ी हो जाए, वहाँ ज्ञान तो बच सकता है पर शिक्षण नहीं, सूचना तो बच सकती है पर संवेदना नहीं, मशीनें तो चलती रहेंगी लेकिन कक्षाओं में मनुष्य धीरे-धीरे कम होते जाएँगे। यही वह बिंदु है जहाँ हमें ठहरकर यह तय करना होगा कि हमें डिजिटल शिक्षा चाहिए या मानवीय शिक्षा क्योंकि भविष्य केवल तकनीक से नहीं शिक्षक और बच्चे के जीवंत संबंध से बनता है।
राजेश कटियार,कानपुर
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