
एक और शैक्षिक सत्र अपने अंतिम पड़ाव पर आकर ठहर गया और एक नया सत्र दस्तक दे चुका है। यह सिर्फ कैलेंडर बदलने का समय नहीं बल्कि यह शिक्षकों के भीतर चल रही एक गहरी आत्ममंथन की प्रक्रिया का समय है। बीते वर्ष में उन्होंने क्या सोचा था, क्या कर पाए और क्या अधूरा रह गया इन सब सवालों के बीच वे खुद को खड़ा पाते हैं। सच कहूं तो हर शिक्षक के पास साल की शुरुआत में सपनों की एक पूरी डायरी होती है। बच्चों को थोड़ा और समझना है, पढ़ाई को थोड़ा और रोचक बनाना है, हर बच्चे तक पहुंचना है, उसे सिर्फ किताबों से नहीं बल्कि जीवन से जोड़ना है लेकिन कई बार परिस्थितियां, व्यवस्थाएं, अतिरिक्त जिम्मेदारियां और सीमित संसाधन उस डायरी के कई पन्नों को अधूरा छोड़ देते हैं।
यह अधूरापन उन्हें सालभर भीतर ही भीतर कचोटता रहता है लेकिन यही तो इस पेशे की खूबसूरती है। हर नया सत्र उन्हें एक और मौका देता है। पिछली कमियों से सीखकर, नई ऊर्जा के साथ, एक बार फिर उसी जुनून के साथ खड़े होने का मौका देता है। इस बार फिर से उन्होंने योजनाएं बनाई हैं जोकि थोड़ी और संवेदनशील, थोड़ी और व्यवहारिक, बच्चों के जीवन से और ज्यादा जुड़ी हुई हैं। शिक्षकों का बच्चों से बस इतना कहना है कि इस बार हम सिर्फ पढ़ाई नहीं करेंगे, हम साथ मिलकर सीखेंगे, समझेंगे, सवाल करेंगे और जिंदगी को थोड़ा बेहतर तरीके से जीने की कोशिश करेंगे। तुम्हारी जिज्ञासा ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है उसे कभी दबने मत देना।
शिक्षकों का अभिभावकों से कहना है कि शिक्षा को केवल अंकों और परिणामों की कसौटी पर न परखें। हर बच्चा एक अलग दुनिया है, उसकी गति, उसकी रुचि, उसकी क्षमता अलग है। हमें मिलकर उसे समझना होगा, उसे समय देना होगा। शिक्षक और अभिभावक जब एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं तभी बच्चा सबसे बेहतर तरीके से विकसित होता है। शिक्षकों का कहना है कि हमारी समाज और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से एक सीधी और स्पष्ट अपेक्षा है यदि आप वास्तव में शिक्षा को बेहतर देखना चाहते हैं तो शिक्षक पर भरोसा कीजिए। उसे थोड़ा और स्वतंत्र सोचने, प्रयोग करने और अपने तरीके से पढ़ाने का अवसर दीजिए।
हर दिन नए निर्देश, हर पल नई जिम्मेदारियां और हर समय मूल्यांकन की तलवार के बीच रचनात्मकता दम तोड़ देती है। शिक्षक जिम्मेदारी से भागने वाले नहीं होते उन्हें केवल जिम्मेदारियों का बोझ नहीं भरोसे का सहारा भी चाहिए। यदि उन्हें थोड़ा और स्वायत्तता मिले, थोड़ा और विश्वास मिले तो वे सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं बल्कि बच्चों का भविष्य गढ़ने का काम और बेहतर तरीके से कर सकते हैं।
नया सत्र उनके लिए एक नई शुरुआत है सिर्फ तारीखों की नहीं बल्कि सोच की। आइए इस बार हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि शिक्षा को बोझ नहीं, एक अवसर बनाएंगे, प्रतिस्पर्धा नहीं सहयोग की भावना को बढ़ाएंगे और सबसे महत्वपूर्ण विश्वास की उस डोर को मजबूत करेंगे जो एक शिक्षक, एक छात्र, एक अभिभावक और पूरे समाज को जोड़ती है।
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राजेश कटियार,कानपुर



